आरक्षण: पहले पिछड़ों को पिछड़ा बनाए रखा - अब क्या ग़रीब सवर्णों को ग़रीब बनाए रखेंगे?

Kalpesh Yagnik column on reservation for upper cast in Gujrat.

Kalpesh Yagnik

संविधान में नहीं, सुप्रीम कोर्ट 50% से आगे देगा नहीं; फिर घोषणाएं क्यों?

‘पिछले दस साल में ख़ुद को ओबीसी बताने वाले दस प्रतिशत बढ़कर 44% हो गए। बीस प्रतिशत अजा है। नौ प्रतिशत जजा। इस तरह कुल 73% को आरक्षण की पात्रता है। यदि इनमें नई, आंदोलन कर रही जातियों को जोड़ लिया जाए तो यह आंकड़ा 80-81% तक पहुंच जाएगा। तो बचेगा कौन?’ - विश्लेषणों से, नेशनल सेम्पल सर्वे के आधार पर


- गुजरात ने अचानक 10% आरक्षण सवर्णों के लिए क्यों किया?
-सीधा संबंध तो पटेल आंदोलन से ही है। किन्तु इसके राष्ट्रीय मायने भी हैं।
- किस तरह के राष्ट्रीय मायने?
- गुजरात में इसकी तत्काल आवश्यकता थी। किन्तु आर्थिक आधार पर आरक्षण भाजपा की नई राजनीतिक रणनीति भी हो सकती है। जैसे उत्तरप्रदेश को यह संकेत देना कि यदि वो भाजपा को जिताता है -तो वहां भी ग़रीब सवर्णों को ऐसा फ़ायदा दे सकती है।
- किन्तु भाजपा को तो पहले से ऊंची जातियों के वोट मिलते हैं?
- ऐसा शहरी क्षेत्रों में होता है। गांवों में नहीं। नरेन्द्र मोदी लहर का अपना निजी प्रभाव था पिछले लोकसभा चुनाव में। अब मोदी एक अलग तरह की आरक्षण राजनीति की ओर बढ़ सकते हैं। दोहरे आरक्षण की राजनीति।
- दोहरे आरक्षण की राजनीति?
- जी हां। जाति आधार पर भी और आर्थिक आधार पर भी। बिहार चुनाव के दौरान आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण व्यवस्था की समीक्षा करने की बात उठा कर तूफान खड़ा कर दिया था। तब बिहार में जातीय कोटे का प्रभाव भांपते हुए मोदी सरकार ने दोहराया था कि वह आरक्षण से कोई छेड़खानी नहीं करेगी। अब गुजरात ने उन्हें अवसर दे दिया है। वहां भाजपा को जीत का पूरा विश्वास है। इसलिए पटेलों को लाभ देने के साथ-साथ वे दोहरा आरक्षण आरम्भ करने का प्रयास करेंगे।
- किन्तु मोदी सरकार ऐसा क्यों करना चाहती है?
- संभवत: मोदी ऊंची जातियों के भाजपा वोट बैंक को सीधा लाभ देना चाहते हैं। कांग्रेस ने अनुसूचित जाति/जनजाति और मुस्लिम 35-38% वोटों पर साठ साल राज किया। संभवत: मोदी बचे 60-65% वर्गों की राजनीति करना चाहते हैं।
- क्या 60-65 प्रतिशत ऊंची जातियां हैं?
- ऊंची जातियों का प्रतिशत तय नहीं है। मंडल आयोग ने सन् ’82 में ऊंची जातियों का प्रतिशत 25 बताया था। सत्रह साल बाद, राष्ट्रीय सेम्पल सर्वे ने कहा 35%। उसी वर्ष, केन्द्र के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण में 38.6% का आंकड़ा आया।
किन्तु ग़रीब सवर्णों को आरक्षण देना एक अलग राजनीति हो सकती है। चूंकि देश में अब राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक तीनों रूप से ताकतवर जातियां आरक्षण मांग रही हैं। गुजरात के पटेल। हरियाणा में जाट। ऐसे में ग़रीब सवर्ण ख़ुद को बुरी तरह ठगा हुआ महसूस कर सकता है। इसलिए : हर राज्य में आन्दोलनरत जातियों को सीधे कोटा देने के साथ ही, आर्थिक आधार पर ग़रीब सवर्णों को शामिल किया जा रहा है।
- किन्तु संविधान में इसकी सीमा तय है। सुप्रीम कोर्ट ने 50% से अधिक आरक्षण पर रोक लगा रखी है। फिर ये लागू कैसे होंगे?
- यह सही है। लागू नहीं हो सकते। राजस्थान का उदाहरण लें। वहां कोई दस साल पहले गुर्जर सहित चार जातियों को पांच प्रतिशत और सवर्णों के लिए चौदह प्रतिशत आरक्षण घोषित किया गया। किन्तु कोर्ट में अटक गया। फिर पिछले साल वसुंधरा सरकार ने दोनों समूहों के लिए अलग विधेयक पास करवाए। किन्तु 50% से अधिक आरक्षण हो जाने की वजह से यह लागू नहीं हो सकता।
- तो तमिलनाडु में 69% कैसे लागू है?
- एक पूरा इतिहास है। वहां उन्होंने शुरू से विधानसभा से पारित विशेष कानून के अंतर्गत यह लागू कर रखा है। फिर भी, जब सुप्रीम कोर्ट ने मशहूर इंदिरा साहनी केस में मंडल रिपोर्ट पर पूरा फैसला सुनाया - तब 50% की सीमा स्पष्टत: तय कर दी। किन्तु तमिलनाडु ने अगले ही साल, 1994 में, विधानसभा से नया कानून पास कर, केन्द्र से संविधान की नवीं अनुसूचि में जगह मांगी। उसी वर्ष केन्द्र ने 76वां संशोधन पास किया। तमिलनाडु की राजनीतिक अनिवार्यता को देखते हुए उन्हें लाभ दे दिया गया। उनके विशेष कानून को राष्ट्रपति डॉ. शंकरदयाल शर्मा की मंजूरी मिल गई। और इस तरह वे संविधान की नवीं अनुसूचि -नाइन्थ शेड्यूल- में आ गए। जिससे न्यायिक समीक्षा से बच सके।
किन्तु लागू हो जाने के बावजूद उनका मामला वर्षों से सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है।
फिर सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 19% नई सीटें बना दी हैं।
- क्या आंध्र में भी ऐसा ही है?
- जी, नहीं। आंध्र के 66.66% आरक्षण में 33.33% महिलाओं के लिए है। जो सभी जातियों की महिलाओं के लिए खुला हुआ है। उसमें 16.66% ऊंची जातियों की महिलाओं का तयशुदा हिस्सा है। इस तरह वहां भी 50% की सीमा का पालन हो रहा है।
- किन्तु जहां लागू ही नहीं हो सकता -जैसे कि राजस्थान या कि ताज़ा मामला गुजरात- तो वहां क्यों कोई इसे मानेगा?
- सरकारें लगातार दावे करती जा रही हैं कि वे सुप्रीम कोर्ट तक इसकी लड़ाई लड़ेंगी। निम्न फायदे हो सकते हैं :

1. पहला फ़ायदा तो यह कि उग्र आंदोलन कमज़ोर पड़ने लगता है।

2. दूसरा : सरकार को समय मिल जाता है।

3. एक ठोस रूप से कहने को बात मिल जाती है कि हमने संवैधानिक रूप से अपनी कार्रवाई पूरी कर दी है।

4. आरम्भिक भरोसा जीत सकती है।

5. सुप्रीम कोर्ट ने भी 50% सीमा तय करते हुए ‘विशेष परिस्थितियों’ की बात कही है। यानी क्या जिन आधारों पर आरक्षण दिया जा रहा है, वे विशेष हैं? किन्तु ठोस होने चाहिए। जैसे दक्षिण राज्यों से पूछा गया कि वे जनसंख्या का जातिगत अनुपात बताएं। तो राज्य सरकारें ऐसी ‘विशेष परिस्थितियां’ दिखाने की कोशिश करेंगी।

6. तमिलनाडु की राह पर सभी राज्य सरकारें, केन्द्र से नवीं अनुसूचि में जगह पाना चाहती हैं। हालांकि यह आसान नहीं होगा। संभव ही नहीं है।

7. एक अंतिम शस्त्र है संविधान के आर्टिकल 15 का क्लॉज़ (4)। इसमें कहा गया है कि राज्य सरकारें; सामाजिक और शैक्षणिक स्तर पर पिछड़े वर्गों के लिए कोई ‘विशेष’ उपाय कर सकती हैं। ताकि वे समाज में आगे बढ़ सकें। इस क्लॉज़ का उपयोग। किन्तु सुप्रीम कोर्ट इसे नहीं मानेगा। और अंतिम फ़ायदा यह कि सत्ता में बैठी पार्टी यह तो दावा कर ही सकती है कि कोर्ट ने नहीं माना। पिछली सरकार तो कानून भी कहां बना पाई थी?

- गुजरात ने सवर्ण ग़रीब की आय सीमा छह लाख रु. सालाना रखी है। यानी 50 हजार रु. महीना। ऐसा क्यों?
- निश्चित रूप से यह सीमा काफी ऊंची है। क्योंकि यदि सरकारी मापदंड से देखें तो केन्द्र सरकार की दो योजनाएं हैं ग़रीब सवर्ण युवाओं के लिए। उच्च पढ़ाई और विदेश में पढ़ने को लेकर। इनमें सीमा परिवार की कुल वार्षिक आय 1 लाख रु. रखी हुई है।

गुजरात में, चूंकि पहला ध्यान पटेलों का रखना है, इसलिए छह लाख की सीमा रखी है। वे अधिकतर किसान हैं। उन्हें आयकर सर्टिफिकेट आसानी से मिल जाएगा। और, यूं भी इतनी आय रखने से 10% सवर्ण इसमें आसानी से आ जाएंगे। ऐसी सोच सरकार की होगी।

- ऊंची जातियों में तो क्या हिन्दुओं के अलावा मुस्लिम भी लाभ उठा पाएंगे?
- हालांकि गुजरात का जब पूरा कानून सामने आएगा -तब इसका खुलासा होगा। वैसे यदि सन् 2000 का नेशनल सेम्पल सर्वे देखें तो मुस्लिम ग्रामीण क्षेत्रों में 26.8% ऊंची जातियों वाले हैं, जबकि शहरी मुसलमानों में से 34.2% अगड़ी जातियों में आते हैं।

इससे ठीक उल्टे, हिन्दू गांवों में मात्र 11.7% ऊंची जातियों वाले हैं। शहरी हिन्दुओं में फॉरवर्ड कास्ट में मात्र 10% हैं। क्योंकि, हर आर्थिक-सामाजिक वर्ग में, हर पिछड़े वर्ग में हिन्दू बहुतायत से हैं। इसलिए अगड़ी जातियों वाले कम ही रहेंगे अनुपात में। संख्या विशाल होगी।
और वोट, संख्या से होते हैं। प्रतिशत तो केवल मीडिया और विश्लेषक लगाते रहते हैं।

कुल जमा ; आरक्षण पर एक नई और बड़ी बहस फिर आरम्भ होगी। लागू तो होगा नहीं इस तरह का कोई भी आरक्षण -क्योंकि संविधान में सामाजिक पिछड़ेपन का ही प्रावधान है- फिर भी आरक्षण को लेकर जिस तरह का आक्रोश है - उसे कम करने का एक उपाय समझ कर ला रहे हैं राजनीतिक दल।

और, यह नरसिंहराव सरकार ने शुरू किया था। तब भी 10%। ठीक ऐसा ही ग़रीब सवर्णों के लिए। किन्तु सुप्रीम कोर्ट ने 50% की बाध्यता बताकर खारिज कर दिया था। इस बार भी गुजरात में कांग्रेस ने एक प्राइवेट बिल विधानसभा में पेश कर 20% कोटा सवर्णों के लिए मांगा था।
तब से हर पार्टी में इसकी कोशिश चल रही है।

जबकि देखना तो यह चाहिए कि आज़ादी के समय 10 वर्ष का समयतय किया गया था। कि इतने समय में देश पिछड़ों को, अजा-जजा को, तरक्की की राह दे देगा।
किन्तु छह दशक गुजर गए। ‘क्रीमी लेयर’ का ही कब्जा बना हुआ है आरक्षण पर।

और यूं देखा जाए तो न तो सरकारी नौकरियां बची हैं, न ही बची हुई सरकारी नौकरियां किसी आकर्षण का केन्द्र रह गई हैं। सिर्फ भ्रत्य, सिपाही, सैिनक या क्लर्क इन चार नौकरियों के लिए ही लाखों आवेदन आते हैं। पढ़े लिखे नौजवानों में इन्हें लेकर कोई उत्साह नहीं बचा है। और जहां तक नए वेतन आयोग से भारी भरकम वेतन वृद्धि की बात है तो युवा समझते हैं कि अगले दस वर्ष तक बात गई। और क्या पता अगले दस वर्षों में सरकार में वेतन वृद्धि का सारा तरीका बदल जाए। और भयंकर काम करना पड़े। नौकरियां पक्की ही न रहें। कुछ भी हो सकता है। काॅर्पोरेट जगत जैसे सीधे परिणाम देने होंगे। दुनिया बदल रही है।

हां, मेडिकल, इंजीनियरिंग और अन्य पढ़ाई में अवश्य युवाओं को भारी कुंठा का सामना करना पड़ रहा है। ख़ासकर मेडिकल में।
समाज में सबको बराबरी का हक मिले, असंभव है। किन्तु देना ही होगा। चाहे पिछड़े हों, चाहे अगड़े। अवसर समान ही होने चाहिए।

आरक्षण, पिछड़ों को पिछड़ा रखने का एक भयावह षड्यंत्र ही सिद्ध हो रहा है।
Source: Bhaskar
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